सिंगापुर के पूर्व विदेश मंत्री जॉर्ज येओ ने नई दिल्ली में कहा है कि भारत को प्रमुख शक्तियां उस तरह खतरे के रूप में नहीं देखतीं, जिस तरह चीन को देखा जाता है। उन्होंने यह बात सोमवार (5 अक्तूबर) को पांचवें कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव के समापन सत्र में विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ चर्चा के दौरान कही। येओ ने भारत की विविधता, भौगोलिक स्थिति और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि बाहरी लोगों को भारत में अपनापन महसूस होता है।
येओ ने क्या कहा
येओ के अनुसार भारत की स्थिति हिंद महासागर के किनारे ऐसी रही है, जहां सदियों से लोगों, संस्कृतियों, मसालों और विचारों की आवाजाही होती रही है। इससे भारत बाहरी दुनिया के लिए खास तौर पर खुला बना। उन्होंने कहा कि इसी वजह से विदेशी आगंतुक भारत में सहज महसूस कर सकते हैं, जबकि चीन में वे “एकरूप लोगों की भीड़ में विदेशी” जैसा अनुभव कर सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि चीन को समझना विदेशियों के लिए पूरी तरह आसान नहीं है।
येओ का कहना था कि भारत ने खुद को प्रमुख शक्तियों के बीच अच्छी स्थिति में रखा है और दक्षिण-पूर्व एशिया, जापान, यूरोप और अमेरिका, सभी चाहते हैं कि भारत अच्छा प्रदर्शन करे। उनके मुताबिक भारत किसी बड़ी ताकत को उस तरह चुनौती देता नहीं दिखता, जिस तरह चीन दिखता है। उन्होंने यह भी माना कि चीन के इतिहास और सामाजिक स्वरूप को देखते हुए उसके वैश्विक वर्चस्व की भूमिका चाहने की संभावना कम है। ये येओ के निजी आकलन हैं, किसी आधिकारिक नीति का हिस्सा नहीं।
डब्ल्यूटीओ पर अलग रुख
इसी सत्र में येओ ने कहा कि भारत और चीन के कई मुद्दों पर समान रुख हैं और दोनों मिलकर अमेरिका के बिना भी विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) को चलाने में भूमिका निभा सकते हैं। रिपोर्टों के अनुसार जयशंकर इससे सहमत नहीं दिखे। उन्होंने कहा कि बाजार में विकृति केवल अमेरिका ने नहीं, दूसरे देशों ने भी पैदा की है। उन्होंने चीन के साथ भारत के बड़े व्यापार घाटे और बेहतर बाजार पहुंच की मांग का संकेत भी दिया। येओ ने डब्ल्यूटीओ के अपीलीय निकाय के जजों की नियुक्तियां रोकने के लिए अमेरिका को जिम्मेदार ठहराया।
येओ ने अलग बातचीत में भारत को चीन के प्रति “बेहद व्यावहारिक” रुख अपनाने की सलाह दी और कहा कि एआई जैसे क्षेत्रों में भारत को अमेरिका या चीन पर अत्यधिक निर्भर नहीं होना चाहिए।
जयशंकर ने क्या कहा
जयशंकर ने मौजूदा दौर को बदलाव का समय बताया और कहा कि आने वाला समय उथल-पुथल और अनिश्चितता वाला हो सकता है। उन्होंने बहु-संरेखण (मल्टी-अलाइनमेंट) की जरूरत पर जोर दिया और कहा कि भारत को अमेरिका, चीन के उभार, रूस के साथ पारंपरिक संबंध और यूरोप के साथ नई संभावनाओं के बीच संतुलन साधना है। उन्होंने संघर्ष, आर्थिक दबाव और ऊर्जा, भोजन तथा उर्वरक से जुड़ी चुनौतियों का भी जिक्र किया।
कार्यक्रम के बारे में
तीन से पांच अक्तूबर तक चला कौटिल्य इकोनॉमिक कॉन्क्लेव इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ का आयोजन है, जो वित्त मंत्रालय के सहयोग से हुआ। इस साल का विषय “रेजिलिएंस इन एन एज ऑफ फ्लक्स” था। समापन सत्र “इंडिया एंड द वर्ल्ड: एडैप्टिव बाय डिजाइन” का संचालन एन.के. सिंह ने किया।

