संचार मंत्रालय ने सैटेलाइट कम्युनिकेशन सेवाओं के नियामकीय ढांचे में भेदभाव के आरोपों को खारिज कर दिया है। मंत्रालय ने गुरुवार को कहा कि सैटेलाइट सेवाओं समेत सभी दूरसंचार सेवाओं के लिए निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण व्यवस्था लागू है। सरकार के अनुसार, लाइसेंस पा चुकी तीनों कंपनियों का सुरक्षा आकलन चल रहा है और वे मोटे तौर पर एक ही नियामकीय चरण में हैं।
तीन सेवाओं को मिल चुका है लाइसेंस
मंत्रालय ने बताया कि नॉन-जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट ऑर्बिट (NGSO) आधारित ग्लोबल मोबाइल पर्सनल कम्युनिकेशन बाय सैटेलाइट (GMPCS) सेवाओं के लिए तीन वैश्विक कंपनियों को दूरसंचार लाइसेंस दिए जा चुके हैं। सरकार के अनुसार ये कंपनियां वनवेब इंडिया, जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस और स्टारलिंक सैटेलाइट कम्युनिकेशन हैं। मंत्रालय ने इसे भारत में सैटेलाइट संचार सेवाएं उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता का हिस्सा बताया।
सुरक्षा शर्तों का पालन अनिवार्य
लाइसेंस की शर्तों के तहत हर लाइसेंसधारी को सुरक्षा से जुड़ी सभी जरूरी शर्तें पूरी करनी होंगी। मंत्रालय के मुताबिक, इन प्रावधानों का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि सैटेलाइट सेवा के जरिए उपयोगकर्ताओं और उनके डेटा की सुरक्षा के लिए तय मानकों का पालन हो।
सरकार ने बताया कि तीनों लाइसेंसधारियों के मामले में सुरक्षा आकलन की प्रक्रिया अभी जारी है। यह पूरी होने के बाद संबंधित कंपनी स्पेक्ट्रम आवंटन के अगले चरण के लिए आगे बढ़ सकेगी।
“किसी को अनुचित लाभ का सवाल नहीं”
मंत्रालय का कहना है कि मौजूदा स्थिति में तीनों कंपनियां मोटे तौर पर एक ही नियामकीय स्तर पर हैं। इसलिए किसी एक कंपनी को दूसरी की तुलना में अनुचित लाभ देने या नियमों को अलग-अलग तरीके से लागू करने की बात सही नहीं है। मंत्रालय ने इस तरह के दावों को बेबुनियाद और गलतफहमी पर आधारित बताया है। सरकार के मुताबिक, लाइसेंसिंग, सुरक्षा मूल्यांकन और स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रक्रिया तय नियमों के तहत चल रही है और सभी लाइसेंसधारियों पर समान नियामकीय प्रक्रिया लागू है।
मस्क के आरोप के बीच आया बयान
यह बयान ऐसे समय आया है जब टेस्ला और स्पेसएक्स के प्रमुख एलन मस्क ने 7 अक्टूबर को सोशल मीडिया पर लिखा कि कुछ लोग स्टारलिंक को भारत में आने से रोक रहे हैं, ताकि उनका “एकाधिकार” बना रहे। जानकारी के अनुसार, मस्क ने अपनी पोस्ट में किसी का नाम नहीं लिया और दावे के समर्थन में कोई सार्वजनिक प्रमाण भी नहीं दिया। मंत्रालय ने अपने बयान में किसी व्यक्ति या कंपनी का नाम नहीं लिया है।
कैसे शुरू होती है सेवा
भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवा शुरू करने के लिए कंपनी को पहले दूरसंचार विभाग से GMPCS लाइसेंस लेना होता है। लाइसेंस मिलने के बाद भी सेवा तुरंत शुरू नहीं हो सकती। इसके लिए सुरक्षा शर्तें पूरी करनी होती हैं और उसके बाद स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रक्रिया आती है।
सरकार ने जनवरी 2026 में संसद को बताया था कि तीनों कंपनियों को लाइसेंस दिए गए हैं। उस समय कुछ अन्य आवेदन खारिज किए गए थे, एक कंपनी ने अपना आवेदन वापस ले लिया था और अमेजन कुइपर का आवेदन जांच में था।

