सुप्रीम कोर्ट का रविवार को विशेष आदेश: दिल्ली में गैरजरूरी बैरिकेड हटें, इंटरनेट और मेट्रो सामान्य हों; दिल्ली पुलिस को अवमानना नोटिस

6 Min Read
सुप्रीम कोर्ट का आदेश: दिल्ली से बैरिकेड हटें, इंटरनेट-मेट्रो सामान्य हों, पुलिस को अवमानना नोटिस

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को विशेष सुनवाई में दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया कि राजधानी में आवाजाही और इंटरनेट सेवा सामान्य की जाए, मेट्रो को सामान्य समय-सारणी के अनुसार चलाया जाए और बैरिकेड केवल वहीं रखे जाएं जहां जरूरत हो। जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने 45 मेट्रो स्टेशन बंद किए जाने से जुड़ी अवमानना याचिका पर दिल्ली पुलिस को नोटिस भी जारी किया। पीठ ने साफ किया कि कानून-व्यवस्था के लिए जरूरी और उचित पाबंदियां लगाई जा सकती हैं।

किन याचिकाओं पर हुई सुनवाई

पीठ के सामने दो याचिकाएं थीं। पहली, 9 अक्तूबर के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कथित उल्लंघन पर अवमानना की मांग वाली याचिका, जो वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने दायर की है। उस दिन मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने कहा था कि मेट्रो सेवाएं पूरी तरह बंद नहीं होनी चाहिए। दूसरी, वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका, जिसमें प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए गए लोगों के मामले में दखल की मांग की गई है। मनोज झा की भी एक याचिका का जिक्र हुआ। पीठ ने कहा कि वह असाधारण परिस्थिति में रविवार को बैठी है और जिन मामलों की औपचारिक सूची नहीं है, उन पर अभी आदेश नहीं देगी। उन्हें बाद में सूचीबद्ध मामलों के साथ जोड़ा जाएगा।

कोर्ट के निर्देश और टिप्पणियां

कोर्ट ने शहर में इंटरनेट सेवा सामान्य रूप से बहाल करने और लोगों की आवाजाही सामान्य करने को कहा। उसने केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल से कहा कि लोगों को अपने पेशे से जुड़े काम करने से न रोका जाए। अदालत ने अदालत परिसर के बाहर से धारा 163 का बोर्ड हटाने को भी कहा।

पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 19(2) का जिक्र करते हुए कहा कि असली सवाल यह है कि पुलिस की लगाई पाबंदियां इस अनुच्छेद के दायरे में किस हद तक आती हैं। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि विरोध-प्रदर्शन का अधिकार विवादित नहीं है, लेकिन उसकी प्रक्रिया पुलिस अधिनियम के दायरे में होनी चाहिए। जस्टिस मोहना ने कहा कि अगर याचिकाकर्ता जनहित को लेकर चिंतित हैं, तो उन्हें शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने और उकसावे से बचने का भरोसा देना चाहिए।

दिल्ली पुलिस के रुख पर पीठ ने कहा कि कानून-व्यवस्था के नाम पर पुलिस को यह स्वतंत्र अधिकार नहीं मिल जाता कि वह राज्य की दलीलों से अलग अपना पक्ष रखे। अदालत ने कहा कि पुलिसकर्मी, वकील या आम नागरिक, सभी के अधिकारों की रक्षा करना उसकी समान जिम्मेदारी है। जस्टिस बागची ने कहा कि लोगों के जीवन और स्वतंत्रता के सवाल पर कोर्ट पूरा मामला सुनकर आदेश देगा।

याचिकाकर्ताओं की दलीलें

कपिल सिब्बल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद 45 मेट्रो स्टेशन बंद रखे गए और चार किलोमीटर के दायरे में इंटरनेट बंद किया गया, जिसे उन्होंने अवमानना और अनुराधा भसीन फैसले के दायरे का मामला बताया। मेनका गुरुस्वामी ने दावा किया कि सात हजार से अधिक लोग हिरासत में लिए गए, जिनमें छात्र नेता और पत्रकार शामिल थे, और कई पूर्व मुख्यमंत्रियों को भी हिरासत में लिया गया। उनके अनुसार सही संख्या पुलिस ने नहीं बताई। उन्होंने स्थिति को “अघोषित आपातकाल” जैसा बताया। वरिष्ठ वकील राकेश खन्ना ने भी यही संख्या रखी।

अन्य वकीलों ने आरोप लगाया कि पुलिसकर्मी बिना नेमप्लेट या बैज के थे, वकीलों को थाने में मुवक्किलों से मिलने नहीं दिया गया और कुछ वकीलों को हिरासत में लिया गया या उनके साथ मारपीट हुई। ये सभी आरोप याचिकाकर्ताओं और वकीलों की ओर से हैं। सुनवाई के बीच कुछ वकीलों के नारे लगाने पर जजों ने नाराजगी जताई और कुछ वरिष्ठ वकीलों ने उनकी ओर से माफी मांगी।

दिल्ली पुलिस का पक्ष

दिल्ली पुलिस की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उनका विस्तृत जवाब अभी तैयार नहीं है। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों को करीब दो बजे हिरासत में लिया गया और छह बजे छोड़ दिया गया, इसलिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका अब टिकती नहीं। उन्होंने कहा कि अवमानना के आरोप में कोई गैरजरूरी रोकटोक नहीं हुई, मेट्रो पूरी तरह चली और कुल 303 स्टेशनों में से सिर्फ 45 पर प्रवेश और निकास रोका गया। उनके अनुसार सभी स्टेशन शनिवार रात 10 बजे से खोल दिए गए हैं।

कोर्ट ने पूछा कि पुलिस ने पहले 57 स्टेशन बंद करने की बात कही थी, फिर 45 बंद किए, तो इन्हें कैसे चुना गया। रिपोर्टों के अनुसार मामले की अगली सुनवाई मंगलवार को होगी।

पृष्ठभूमि

ये पाबंदियां 10 अक्तूबर को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान लगाई गई थीं। प्रदर्शन मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर बुलाया गया था। दिल्ली पुलिस के सूत्रों ने पहले करीब एक हजार लोगों को हिरासत में लेने की बात बताई थी, जबकि याचिकाकर्ता इससे कहीं बड़ी संख्या का दावा कर रहे हैं।

Share This Article
Exit mobile version