बोलने में अक्षम और मानसिक रूप से कमजोर युवती से दुष्कर्म के मामले में फास्ट ट्रैक कोर्ट ने आरोपी को दोषी करार देते हुए 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने दोषी पर 20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। मामला थाना ताजगंज क्षेत्र का है। अदालत ने पीड़िता के इशारों और उसकी छोटी बहन के लिखे बयान को पुख्ता साक्ष्य माना। फैसला फास्ट ट्रैक कोर्ट के जज नीरज श्रीवास्तव ने सुनाया।
क्या था मामला
ताजगंज थाने में दर्ज प्राथमिकी के अनुसार, घटना 20 मई 2024 की दोपहर की है। युवती के पिता ने आरोप लगाया था कि वह उस समय घर के बाहर सो रहे थे। पत्नी मायके में थीं और परिवार के बाकी सदस्य काम से बाहर थे। घर में 18 साल की बेटी अकेली थी, जो मानसिक रूप से कमजोर और मूक है।
शिकायत में कहा गया कि पड़ोस में दुकान चलाने वाला गोविंदा उर्फ हरगोविंद घर में घुसा और युवती से दुष्कर्म किया। पिता के मुताबिक, नींद खुलने पर वह अंदर गए तो आरोपी उन्हें देखकर भाग गया। बेटी रोते हुए उनके पास पहुंची। बाद में छोटी बेटी ने पूछा तो पीड़िता ने इशारों में घटना की जानकारी दी।
अदालत में कैसे साबित हुआ मामला
विवेचक ने 12 जून 2024 को विवेचना पूरी कर अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया। अभियोजन पक्ष ने पीड़िता और उसकी छोटी बहन समेत पांच गवाह पेश किए। पीड़िता ने अदालत में इशारों से अपनी बात रखी, जिसे छोटी बहन ने लिखकर बयान के रूप में दर्ज कराया। बचाव पक्ष की ओर से भी चार गवाह पेश हुए, जिन्होंने मारपीट होने की बात कही।
सबूतों और गवाहों के आधार पर अदालत ने आरोपी को दोषी माना और सजा के साथ जुर्माना लगाया।
बचाव पक्ष की दलीलें, जो अदालत में नहीं टिकीं
आरोपी के अधिवक्ता ने कई तर्क दिए:
- विवेचक ने घटनास्थल के आसपास के लोगों को गवाह नहीं बनाया।
- डॉक्टर ने दुष्कर्म की स्पष्ट पुष्टि नहीं की।
- प्राथमिकी घटना के दो दिन बाद दर्ज कराई गई।
- कोई स्वतंत्र गवाह पेश नहीं किया गया।
अदालत ने ये तर्क स्वीकार नहीं किए। अदालत ने कहा कि विवेचना की कमी का लाभ आरोपी को नहीं दिया जा सकता और दो दिन बाद प्राथमिकी दर्ज कराना देरी की श्रेणी में नहीं आता। स्वतंत्र गवाह के सवाल पर अदालत ने कहा कि जिस व्यक्ति की बेटी मानसिक रूप से कमजोर हो, वह समाज में कलंक माने जाने वाला ऐसा आरोप अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगाकर यूं ही नहीं लगाएगा।

