वोट चोरी के आरोपों के बीच 124 पूर्व अफसरों का खुला पत्र: चुनाव आयोग और SIR का समर्थन, आरोपों के लिए ठोस सबूत की मांग

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124 पूर्व IAS-IFS अधिकारियों का खुला पत्र: चुनाव आयोग और SIR का समर्थन

चुनाव में धांधली के आरोपों को लेकर जारी राजनीतिक विवाद के बीच 124 पूर्व IAS, IFS और अन्य सेवाओं के अधिकारियों ने चुनाव आयोग (ECI) के समर्थन में खुला पत्र जारी किया है। पत्र में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को जरूरी प्रक्रिया बताया गया है। साथ ही कहा गया है कि चुनावी गड़बड़ी के आरोप सत्यापन योग्य सबूतों के आधार पर लगाए जाने चाहिए। पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल का नाम बताया गया है। यह पत्र ऐसे समय आया है, जब विपक्ष मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और SIR पर रोक की मांग को लेकर दिल्ली में प्रदर्शन कर रहा है।

पत्र में क्या कहा गया

पूर्व अधिकारियों ने लिखा है कि देश की चुनावी व्यवस्था में समय के साथ बड़ा बदलाव आया है। उनके अनुसार पहले बूथ कब्जा, मतपेटियों में फर्जी वोट और हिंसा जैसी समस्याएं देखने को मिलती थीं, जबकि अब कई सुरक्षा उपाय लागू हैं। इनमें मतदान केंद्रों पर उम्मीदवारों के एजेंटों की मौजूदगी, EVM की सीलिंग, स्ट्रॉन्ग रूम की सुरक्षा और VVPAT पर्चियों का सत्यापन शामिल हैं।

पत्र का मूल तर्क यह है कि कोई व्यवस्था ऐसी नहीं हो सकती जो जीतने पर ईमानदार और हारने पर धांधली वाली मानी जाए। अधिकारियों ने कहा कि केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी इसी आयोग के तहत कई विधानसभा चुनाव हार चुकी है और 2024 के लोकसभा चुनाव में उसे अकेले दम पर पूर्ण बहुमत नहीं मिला था। उनके मुताबिक इन उदाहरणों के आधार पर धांधली के आरोपों पर चर्चा ठोस सबूतों के साथ होनी चाहिए।

बिहार का उदाहरण

पत्र में 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव का हवाला दिया गया है। पूर्व अधिकारियों का दावा है कि इस चुनाव में किसी भी सीट पर दोबारा मतदान की जरूरत नहीं पड़ी और 1951 के बाद सबसे ज्यादा मतदान दर्ज हुआ। उन्होंने इसे चुनाव प्रबंधन में सुधार का संकेत बताया। ये दावे पत्र के हैं और इनकी आधिकारिक आंकड़ों से अलग जांच जरूरी है।

SIR को क्यों जरूरी बताया

अधिकारियों के अनुसार SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को सही और अपडेट रखना है। इसके तहत मृत मतदाताओं, एक से ज्यादा जगह दर्ज नामों और स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुके लोगों की जांच होती है। पत्र में कहा गया है कि सूची में गलतियां रहने से फर्जी पहचान पर वोट डाले जाने की आशंका बढ़ती है।

पत्र में बिहार में पुनरीक्षण के जो आंकड़े दिए गए हैं, वे इस तरह हैं:

  • करीब 22 लाख मृत मतदाताओं की पहचान
  • करीब सात लाख डुप्लीकेट प्रविष्टियां
  • लगभग 21.5 लाख नए मतदाताओं के नाम जुड़े

साथ ही पत्र में एक रिपोर्ट के अनुसार यह भी कहा गया है कि अदालत ने SIR कराने के चुनाव आयोग के अधिकार को बरकरार रखा है। इस बात की आधिकारिक पुष्टि के लिए संबंधित अदालती आदेश देखना जरूरी है।

नाम कटने की आशंका पर क्या कहा

पूर्व अधिकारियों ने माना कि पुनरीक्षण के दौरान किसी पात्र मतदाता का नाम गलती से कट सकता है, इसलिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय होने चाहिए। उन्होंने कहा कि प्रक्रिया में मसौदा सूची का प्रकाशन, दावे और आपत्तियों का मौका, सुनवाई और अपील की व्यवस्था है। उनके अनुसार सुधारों या प्रशासनिक गलतियों पर सवाल उठाना गलत नहीं है, लेकिन जांच तय कानूनी प्रक्रिया से होनी चाहिए।

सबूत की जिम्मेदारी और नागरिकों से अपील

पत्र में कहा गया है कि हर नागरिक को सवाल पूछने का अधिकार है, पर आरोप साबित करने की जिम्मेदारी आरोप लगाने वाले की है। अधिकारियों ने मतदाता सूची पर आपत्ति दर्ज कराने और हाई कोर्ट में चुनाव याचिका दायर करने जैसे कानूनी रास्तों का जिक्र किया। उन्होंने चेतावनी दी कि बिना सबूत के लगाए गए आरोप चुनावी प्रक्रिया पर जनता का भरोसा कमजोर कर सकते हैं।

पत्र में नागरिकों से अपील की गई कि वे मतदाता सूची में अपना नाम जांचें और परिवार, पड़ोसियों और प्रवासी मजदूरों की मदद करें। बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) और अन्य चुनाव कर्मियों की भूमिका की भी सराहना की गई।

विपक्ष का पक्ष और अब तक की स्थिति

विपक्ष ‘वोट चोरी’ के आरोप लगाते हुए मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे और SIR पर रोक की मांग कर रहा है। इस पत्र पर विपक्षी दलों या निर्वाचन आयोग की प्रतिक्रिया इस खबर के लिखे जाने तक हमारे पास उपलब्ध नहीं है। इससे पहले 42 पूर्व न्यायाधीशों के भी खुला पत्र लिखे जाने की जानकारी सामने आई थी। नई प्रतिक्रियाएं आने पर खबर अपडेट की जाएगी।

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