सुप्रीम कोर्ट ने कोलकाता में राजनीतिक सलाहकार कंपनी आई-पैक के दफ्तर की तलाशी में कथित बाधा से जुड़ी प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की याचिका पर गुरुवार, 29 अक्तूबर को सुनवाई पूरी कर आदेश सुरक्षित रख लिया। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया की पीठ ने यह आदेश एक सीमित प्रश्न पर सुरक्षित रखा है। प्रश्न यह है कि मामला सीबीआई को सौंपा जाए या इसे पश्चिम बंगाल की नई निर्वाचित सरकार पर छोड़ा जाए।
ममता बनर्जी का पक्ष
पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि राज्य में सरकार बदल चुकी है और अब कोई बाधा नहीं है। उनके अनुसार, राज्य सरकार किसी भी मामले को सीबीआई को सौंपने के लिए स्वतंत्र है, इसलिए इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश की जरूरत नहीं है। पीठ ने भी कहा कि सिब्बल की दलील यही है कि राज्य खुद मामला सीबीआई को दे सकता है।
ईडी की याचिका क्या कहती है
ईडी ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर एफआईआर दर्ज करने और स्वतंत्र जांच की मांग की है। एजेंसी का आरोप है कि इस साल जनवरी में कोयला घोटाले से जुड़ी मनी लॉन्ड्रिंग जांच के सिलसिले में आई-पैक के कोलकाता दफ्तर पर तलाशी के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य के कुछ पुलिस अधिकारियों ने उसके काम में बाधा डाली। ईडी का यह भी आरोप है कि मौके से कुछ फाइलें हटाई गईं। ये आरोप अदालत में साबित नहीं हुए हैं।
तृणमूल कांग्रेस ने इस मामले में अलग पक्ष रखा है। रिपोर्टों के अनुसार, पार्टी ने कोलकाता हाईकोर्ट में कहा था कि एजेंसी ने चुनाव से जुड़े संवेदनशील दस्तावेज लेने की कोशिश की।
अब तक की सुनवाई
15 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने ईडी अधिकारियों के खिलाफ पश्चिम बंगाल पुलिस की ओर से दर्ज की गई एफआईआर पर रोक लगाई थी। साथ ही परिसर के सीसीटीवी फुटेज और अन्य डिजिटल रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया था। अप्रैल की एक सुनवाई में अदालत ने मौखिक टिप्पणी में कहा था कि यदि कोई मुख्यमंत्री किसी जांच में दखल देता है, तो इससे लोकतंत्र खतरे में पड़ता है। यह मौखिक टिप्पणी थी, अंतिम निर्णय नहीं। अगस्त में अदालत ने मामले को सीबीआई को सौंपने की मंशा के संकेत दिए थे।
आगे क्या
अब अदालत का आदेश आना बाकी है। इसी से तय होगा कि जांच सीबीआई को जाएगी या राज्य सरकार अपने स्तर पर निर्णय लेगी।

