मुंबई की विशेष सीबीआई अदालत ने शुक्रवार, 30 अक्टूबर को गैंगस्टर छोटा राजन और चार अन्य आरोपियों को 2009 में पुणे में शिवसेना नेता अजय भोसले की हत्या की कोशिश के मामले में बरी कर दिया। विशेष न्यायाधीश नरेंद्रनाथ प्रधान ने सभी पांचों को हत्या की कोशिश, आपराधिक साजिश और आर्म्स एक्ट के आरोपों से मुक्त किया। फैसले का विस्तृत आदेश अभी जारी नहीं हुआ है, इसलिए बरी करने के कारण सामने नहीं आए हैं।
किन-किन को मिली राहत
छोटा राजन का असली नाम राजेंद्र सदाशिव निकाळजे है। उसके अलावा पुणे के कारोबारी और बिल्डर सुरेंद्र अग्रवाल, शकीब आलम खान, राजेश यादव और विजय पुरुषोत्तम साल्वी भी बरी हुए हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने राजन और खान को किसी अन्य मामले में आवश्यकता न होने पर रिहा करने का निर्देश दिया।
जेल से रिहाई नहीं
70 वर्षीय राजन सुरक्षा कारणों से दिल्ली की तिहाड़ जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुनवाई में शामिल हुआ। रिपोर्टों के अनुसार उसे इस मामले में 2025 में जमानत मिल गई थी, पर वह जेल से बाहर नहीं आएगा, क्योंकि वह पत्रकार ज्योतिर्मय डे (जे डे) की 2011 में हुई हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा है। मुंबई के होटल व्यवसायी जया शेट्टी की 2001 में हुई हत्या के मामले में भी उसे उम्रकैद सुनाई गई थी। इस मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट से मिली राहत को सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2025 में रद्द कर दिया था।
क्या था मामला
यह घटना 11 अक्टूबर 2009 की है, जब पुणे के कोरेगांव इलाके में चुनाव प्रचार के दौरान मोटरसाइकिल सवार हमलावरों ने भोसले की गाड़ी पर गोली चलाई थी। भोसले उस समय विधानसभा चुनाव में शिवसेना के उम्मीदवार थे। वे सुरक्षित रहे, लेकिन गाड़ी में बैठे उनके ड्राइवर को गोली लगी।
अभियोजन पक्ष का दावा था कि हमले की जड़ पुणे के बिल्डर सुरेंद्र अग्रवाल और उनके भाइयों के बीच संपत्ति विवाद थी। अभियोजन के अनुसार भोसले का संबंध अग्रवाल बंधुओं में से एक से दोस्ती का था और राजन को शक था कि वे समझौते की राह में अड़चन हैं। पुरानी रिपोर्टों में सुरेंद्र अग्रवाल को 2024 के पुणे पोर्श कार हादसे के नाबालिग आरोपी का दादा बताया गया है। यह मामला उससे अलग है।
अभियोजन ने यह भी दावा किया था कि राजन ने फोन पर धमकी दी थी और भोसले को उसकी ओर से कई कॉल आए थे। बचाव पक्ष का कहना था कि साजिश में राजन के शामिल होने का कोई ठोस सबूत नहीं है। ये दोनों पक्ष के दावे हैं, और अदालत के आदेश के अभाव में यह साफ नहीं है कि अदालत ने किसे कैसे परखा।
जांच का सफर
मामला शुरू में पुणे के बंड गार्डन थाने में दर्ज हुआ और बाद में महाराष्ट्र सीआईडी ने जांच की। 2015 में राजन को इंडोनेशिया से भारत लाए जाने के बाद महाराष्ट्र सरकार के आदेश पर उसके खिलाफ दर्ज दर्जनों मामलों के साथ यह केस भी सीबीआई को सौंप दिया गया। फैसले के खिलाफ अपील को लेकर अभी कोई जानकारी सामने नहीं आई है।

