दो से ज्यादा बच्चों पर चुनाव लड़ने की रोक ‘अपनी प्रासंगिकता खो चुकी’: सुप्रीम कोर्ट ने 2003 का फैसला बड़ी पीठ को भेजा

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दो बच्चों की सीमा वाले चुनावी कानून पर सुप्रीम कोर्ट: जावेद फैसला बड़ी पीठ को

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दो से ज्यादा बच्चे होने पर स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानून देश की बदली जनसांख्यिकीय स्थिति में अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। बुधवार, 4 नवंबर को जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने इस सिलसिले में 2003 के ‘जावेद बनाम हरियाणा राज्य’ फैसले को पुनर्विचार के लिए बड़ी पीठ को भेज दिया। उस फैसले में कोर्ट ने ऐसे प्रावधान को वैध ठहराया था।

किस मामले में आया फैसला

यह आदेश महाराष्ट्र के अमरावती जिले की काकोडा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले की अपील पर आया। उन्हें तीसरी संतान होने पर महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत अयोग्य घोषित किया गया था। बॉम्बे हाई कोर्ट ने यह अयोग्यता बरकरार रखी थी। सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 में हाई कोर्ट के फैसले के अमल पर रोक लगा दी थी। अब पीठ ने इंगले की अपील मंजूर करते हुए उनकी अयोग्यता रद्द कर दी।

कोर्ट ने क्या कहा

पीठ ने फैसले में देश की कुल प्रजनन दर (TFR) का हवाला दिया, जो 2003 में 3.0 थी और अब घटकर 1.9 रह गई है। यह आबादी को स्थिर रखने के लिए जरूरी 2.1 के स्तर से नीचे है। जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि इन जनसांख्यिकीय बदलावों को नजरअंदाज करने पर देश को गंभीर नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं। रिपोर्टों के अनुसार फैसले में यह भी कहा गया कि आबादी बढ़ने के डर के आधार पर बने ऐसे कानूनों को जारी रखना अब उचित नहीं।

जुलाई में सुनवाई के दौरान जस्टिस नरसिम्हा ने मौखिक टिप्पणी में कहा था, “यह कैसी बेकार नीति है? जावेद बनाम हरियाणा पर पुनर्विचार होना चाहिए। देश बदल चुका है।” कोर्ट ने अधिवक्ता रुक्मिणी बोबडे को न्यायमित्र नियुक्त किया था। उन्होंने अन्य राज्यों के ऐसे कानूनों का ब्योरा जुटाया। सुनवाई पूरी होने पर 4 अगस्त को फैसला सुरक्षित रखा गया था।

2003 का फैसला क्या था

जावेद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 के उस प्रावधान को सही ठहराया था, जिसके तहत दो से ज्यादा जीवित बच्चों वाला व्यक्ति पंचायत चुनाव नहीं लड़ सकता। अदालत ने माना था कि यह पाबंदी मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं है और परिवार नियोजन को बढ़ावा देने का उचित उपाय है। उस फैसले का आधार यह था कि चुनाव लड़ना मौलिक अधिकार नहीं है। चूंकि वह फैसला तीन जजों की पीठ ने दिया था, इसलिए उस पर पुनर्विचार का फैसला अब बड़ी पीठ करेगी।

अब क्या होगा

कोर्ट ने अभी दो से ज्यादा बच्चों वाले उम्मीदवारों पर रोक लगाने वाले सभी राज्यों के कानून रद्द नहीं किए हैं। असल फैसला बड़ी पीठ करेगी, जो तय करेगी कि 2003 का फैसला सही था या नहीं। सुनवाई के दौरान पेश संकलन के अनुसार असम, गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और उत्तराखंड जैसे राज्यों में अब भी ऐसे प्रावधान हैं। कई राज्य इन्हें पहले ही हटा चुके हैं। बड़ी पीठ का फैसला आने तक कई राज्यों में चुनाव लड़ने की पात्रता से जुड़े ऐसे मामलों की कानूनी स्थिति पर सबकी नजर रहेगी।

अपडेट: यह खबर 4 नवंबर 2026 की दोपहर तक उपलब्ध जानकारी पर आधारित है। फैसले की पूरी प्रति उपलब्ध होने पर इसे अपडेट किया जाएगा।

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