इलाहाबाद हाईकोर्ट: जाली गिफ्ट डीड रद्द करने का अधिकार सीनियर सिटीजन ट्रिब्यूनल को नहीं, सिविल कोर्ट जाना होगा

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सीनियर सिटीजन ट्रिब्यूनल जाली गिफ्ट डीड रद्द नहीं कर सकता, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा — जाना होगा सिविल कोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अगर कोई वरिष्ठ नागरिक यह दावा करे कि उसकी संपत्ति का गिफ्ट डीड (दान विलेख) उसने बनवाया ही नहीं और वह धोखाधड़ी, दबाव या जालसाजी से तैयार कराया गया है, तो माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम, 2007 के तहत गठित न्यायाधिकरण उस दस्तावेज को शून्य घोषित कर रद्द नहीं कर सकता। ऐसे मामलों में वरिष्ठ नागरिक को सक्षम सिविल कोर्ट का ही रुख करना होगा। न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने यह व्यवस्था ललितपुर के एक 68 वर्षीय बुजुर्ग की याचिका पर दी।

क्या था मामला

याचिकाकर्ता का आरोप है कि उसकी बेटी गरिमा यादव और दामाद देवेंद्र सिंह यादव ने ललितपुर स्थित उसके मकान के संबंध में 18 नवंबर 2023 को एक रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड जाली तरीके से तैयार करा लिया। याचिकाकर्ता के मुताबिक यह मकान उसका एकमात्र आश्रय है और इस दस्तावेज पर उसके हस्ताक्षर तक नहीं हैं। उसने आरोप लगाया कि इसी दस्तावेज के आधार पर उसके साथ मारपीट की गई और उसे मकान से बेदखल कर दिया गया। याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि गिफ्ट डीड में बेटी की ओर से उसकी देखभाल करने जैसी कोई शर्त दर्ज नहीं थी।

अधिनियम की धारा 22 और 23 के तहत दिए गए उसके प्रतिवेदनों पर कार्रवाई न होने पर याचिकाकर्ता ने प्रशासन से गुहार लगाई, लेकिन 23 जून 2026 को ललितपुर के जिलाधिकारी ने उसे मकान से बेदखल कराने की मांग खारिज कर दी। इसी आदेश को चुनौती देते हुए वह हाईकोर्ट पहुंचा।

कोर्ट ने क्या कहा

हाईकोर्ट ने कहा कि अधिनियम की धारा 23(1) एक विशिष्ट स्थिति में ही लागू होती है — जब संपत्ति इस शर्त पर हस्तांतरित की गई हो कि हस्तांतरण पाने वाला वरिष्ठ नागरिक की मूलभूत जरूरतों और शारीरिक देखभाल का ध्यान रखेगा, और बाद में उस शर्त का उल्लंघन हो। ऐसी स्थिति में कानून की दृष्टि से हस्तांतरण को धोखाधड़ी या दबाव से कराया गया माना जा सकता है और वरिष्ठ नागरिक के विकल्प पर उसे शून्य घोषित किया जा सकता है।

लेकिन जब मामला यह हो कि दस्तावेज बना ही नहीं, या हस्ताक्षर जाली हैं, या सामान्य धोखाधड़ी व अनुचित प्रभाव का आरोप है — तो यह धारा 23(1) के दायरे से बाहर की बात है और इसका फैसला करने का अधिकार न्यायाधिकरण को नहीं, बल्कि सामान्य दीवानी क्षेत्राधिकार वाले सिविल कोर्ट को है। कोर्ट ने अपने पहले के श्यामजी शुक्ला बनाम उत्तर प्रदेश राज्य फैसले का हवाला देते हुए दोहराया कि सीनियर सिटीजन ट्रिब्यूनल के पास सिविल कोर्ट जैसी व्यापक शक्तियां नहीं हैं।

अपनी बात स्पष्ट करने के लिए खंडपीठ ने एक दिलचस्प उदाहरण दिया — अगर गरिमा यादव याचिकाकर्ता की बेटी न होतीं और देवेंद्र सिंह यादव उसके दामाद न होते, तो क्या महज जालसाजी के आरोप पर गिफ्ट डीड रद्द कराने की ऐसी याचिका सीनियर सिटीजन ट्रिब्यूनल में चल पाती? कोर्ट ने खुद इसका जवाब नकारात्मक दिया, यह रेखांकित करते हुए कि पक्षकारों के बीच रिश्ता बदलने से न्यायाधिकरण के अधिकार क्षेत्र की सीमा नहीं बदल जाती।

जिलाधिकारियों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल

मामले में एक अहम पहलू यह भी था कि ललितपुर के डीएम ने गिफ्ट डीड की वैधता जांचने के लिए एक कमेटी गठित करने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि जब किसी न्यायाधिकरण या प्राधिकारी को पक्षकारों के अधिकारों पर अंतिम फैसला देने की जिम्मेदारी सौंपी गई हो, तो मामले को प्रशासनिक कमेटी के हवाले कर जांच कराना न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप नहीं है। कोर्ट ने राज्य के सभी जिलाधिकारियों और उपजिलाधिकारियों को आगाह किया कि अधिनियम के तहत न्यायिक या अर्ध-न्यायिक कामकाज करते समय निर्धारित विधिक प्रक्रिया का ही पालन किया जाए।

याचिकाकर्ता को क्या राहत मिली

अदालत ने माना कि गिफ्ट डीड को चुनौती देने का पूरा विवाद सीनियर सिटीजन एक्ट के तहत होने वाली कार्यवाही के दायरे से बाहर है, इसलिए याचिका खारिज कर दी गई। हालांकि कोर्ट ने याचिकाकर्ता को यह छूट दी कि वह अपने स्वामित्व और कब्जे से जुड़े अधिकार स्थापित करने तथा गिफ्ट डीड को रद्द कराने के लिए सक्षम सिविल कोर्ट का रुख कर सकता है।

फैसले का महत्व

यह फैसला वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत बनी न्यायाधिकरण व्यवस्था की सीमाओं को स्पष्ट करता है, जो अक्सर पारिवारिक संपत्ति विवादों में उलझ जाती है। कोर्ट के इस रुख से यह साफ संदेश जाता है कि न्यायाधिकरण भरण-पोषण, बुनियादी जरूरतों और वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा से जुड़े मामलों तक सीमित है, जबकि स्वामित्व या दस्तावेज की मौलिक वैधता जैसे जटिल सिविल विवादों का निपटारा सक्षम सिविल कोर्ट में ही हो सकता है। साथ ही जिलाधिकारियों को दी गई हिदायत भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई प्रक्रिया को और स्पष्ट कर सकती है।

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