ग्रेटर नोएडा के सेक्टर पाई-1 स्थित पंजाब नेशनल बैंक की शाखा में खाताधारकों के खातों से करोड़ों रुपये की हेराफेरी के मामले में सीबीआई ने बैंक की कार्यालय सहायक दीपांशी और निजी व्यक्ति आशुतोष कुमार पाठक को गिरफ्तार किया है। सीबीआई के अनुसार, ग्राहकों के खातों से 10.24 करोड़ रुपये बिना अधिकृत अनुमति के निकाले गए। जांच एजेंसी अब यह पता लगा रही है कि रकम कहां-कहां गई और इसमें और कौन शामिल था।
गिरफ्तारी और कानूनी स्थिति
सीबीआई की 3 नवंबर को जारी प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक, आशुतोष कुमार पाठक को महाराष्ट्र के पुणे से गिरफ्तार किया गया। उसे पुणे की विशेष अदालत में पेश कर ट्रांजिट रिमांड ली गई है। दोनों आरोपियों से पूछताछ जारी है। एजेंसी ने यह मामला 29 अक्टूबर को दर्ज किया था। आरोप है कि दीपांशी ने निजी व्यक्ति और अन्य अज्ञात लोगों के साथ मिलकर खातों से रकम निकाली और दूसरी जगह भेजी। ये सभी आरोप हैं और इन पर अदालत में फैसला होना बाकी है।
बैंक की शिकायत में क्या है
बैंक के मुख्य प्रबंधक ने 23 अक्टूबर को शिकायत दी थी। शिकायत के अनुसार, ग्राहकों के खातों से बिना अनुमति डेबिट लेनदेन किए गए। आरोप है कि इन लेनदेन के लिए बैंक के छह अधिकारियों-कर्मचारियों की यूजर आईडी और पासवर्ड का इस्तेमाल हुआ। संबंधित कर्मचारियों की इसमें कोई भूमिका थी या उनकी जानकारी के बिना उनकी आईडी इस्तेमाल हुई, यह जांच का विषय है।
शिकायत में कहा गया है कि पूछताछ में दीपांशी ने इन लेनदेन को सही ठहराने की कोशिश की, लेकिन बैंक को इनसे जुड़े वाउचर और अनुमति के दस्तावेज नहीं मिले। यह भी आरोप है कि उसने आशुतोष के कहने पर पैसे ट्रांसफर करने और वाउचर नष्ट करने की बात कथित तौर पर स्वीकार की। मामला भारतीय न्याय संहिता, आईटी एक्ट और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं में दर्ज है।
पद को लेकर अलग जानकारी
सीबीआई की जानकारी में दीपांशी बैंक में कार्यालय सहायक (सब-स्टाफ श्रेणी) के पद पर तैनात थी। बैंक रिकॉर्ड के हवाले से मिली जानकारी में उसकी तैनाती चपरासी पद पर बताई गई है। यह भी बताया जा रहा है कि वह बीटेक पास है, पर इसकी पुष्टि जांच एजेंसी ने नहीं की है। इन पदों में अंतर पर बैंक या सीबीआई की ओर से अलग से कोई स्पष्टीकरण नहीं आया है।
कैसे होती रही हेराफेरी, क्या हैं आरोप
प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, आरोप है कि दीपांशी ऐसे खाताधारकों को निशाना बनाती थी जिन्हें जमीन अधिग्रहण का मुआवजा मिला था, और इनमें कम पढ़े-लिखे लोग भी थे। यह भी आरोप है कि उसने खाताधारकों को अपना निजी मोबाइल नंबर दे रखा था और उनके बैंक पहुंचने पर बहाने से उन्हें अंदर जाने से रोक देती थी। आरोप है कि रकम का लेनदेन छिपाने के लिए गांव के जान-पहचान वालों के खातों का इस्तेमाल हुआ। इन बातों की सत्यापित पुष्टि जांच पूरी होने पर ही हो सकेगी।
कई खाताधारकों ने यह भी आरोप लगाया है कि बचत खातों और सावधि जमा (एफडी) से बिना जानकारी रकम निकाली गई, और कुछ के मोबाइल नंबर व ईमेल बदल दिए गए, जिससे उन्हें लेनदेन की सूचना नहीं मिली। बैंक की आंतरिक जांच में कुछ अन्य लोगों के खाते भी सामने आए हैं। इनकी भूमिका की जांच चल रही है।
रकम पर अलग-अलग दावे
सीबीआई के मामले में 10.24 करोड़ रुपये का उल्लेख है, जबकि शुरुआती शिकायतों में हेराफेरी 35 करोड़ रुपये से अधिक की बताई गई थी। खाताधारकों का आरोप है कि गड़बड़ी करीब तीन साल चली। अंतिम आंकड़ा जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।
खाताधारकों को पैसा लौटाने की स्थिति
खाताधारकों का नेतृत्व कर रहे ब्रिजेश भाटी ने दावा किया है कि बैंक की ओर से लगभग 70 प्रतिशत खाताधारकों को रकम लौटाने की बात कही गई है और बाकी को जल्द भुगतान का आश्वासन मिला है। कई खाताधारक रकम लौटने के बाद भी उसका इस्तेमाल नहीं कर पा रहे, क्योंकि केवाईसी प्रक्रिया पूरी होने में दो से तीन दिन लग रहे हैं। इस बारे में बैंक अधिकारियों से संपर्क की कोशिश की गई, लेकिन बात नहीं हो सकी। मंगलवार को दिनभर बड़ी संख्या में प्रभावित खाताधारक बैंक पहुंचते रहे।
आगे क्या
सीबीआई यह जांच करेगी कि निकाली गई रकम किन खातों में गई, पूरी प्रक्रिया में अन्य कौन शामिल थे और बैंक के आंतरिक लेनदेन व अनधिकृत डेबिट की स्थिति क्या थी। इसके आधार पर आगे की गिरफ्तारियां और कार्रवाई तय होगी।

