मथुरा। जिले की 495 ग्राम पंचायतों में नए विकास कार्य मंजूरी के इंतजार में अटके हैं। जिला पंचायतराज कार्यालय के अनुसार पिछले पांच महीनों में अनुमोदन के लिए केवल 50 फाइलें पहुंचीं, जिनमें से 32 जांच के बाद मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ) को भेजी गई हैं। अब तक किसी पंचायत के नए कार्यों को अंतिम मंजूरी नहीं मिल सकी है। ग्राम प्रधानों का आरोप है कि नए कामों के साथ पुराने कार्यों के भुगतान भी रुके हुए हैं।
कहां अटकी हैं फाइलें
जिला पंचायतराज कार्यालय पहुंची 50 फाइलों में से 32 सीडीओ को भेजी जा चुकी हैं, जबकि 18 फाइलों में कमियां बताकर उन्हें पूरा कराया जा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार करीब 250 पंचायतों की फाइलें महीनों से ब्लॉक या अन्य स्तरों पर लंबित हैं और जिला कार्यालय तक पहुंची ही नहीं।
जिला पंचायतराज अधिकारी धनंजय जायसवाल ने बताया कि जांच के बाद भेजी गई 32 फाइलों के जल्द अनुमोदन की उम्मीद है। बाकी फाइलों में कमियां हैं, जिन्हें पूरा कराया जा रहा है।
प्रधानों का आरोप
प्रधानों का कहना है कि नए कार्यों की मंजूरी के साथ पुराने कार्यों का भुगतान भी नहीं हो रहा है। उनके अनुसार ग्राम पंचायत सचिव दबाव का हवाला देकर भुगतान नहीं कर रहे और अन्य कार्यों में भी सहयोग नहीं कर रहे। ग्राम प्रधान संगठन ने देवेंद्र प्रधान के नेतृत्व में कलेक्ट्रेट पहुंचकर जिलाधिकारी को ज्ञापन दिया था, लेकिन प्रधानों के अनुसार स्थिति में बदलाव नहीं आया। सचिवों या प्रशासन का पक्ष भुगतान के आरोप पर अभी सामने नहीं आया है।
कहा जा रहा है कि नई व्यवस्था में पहले से कराए गए कार्यों के भुगतान के लिए अलग से अनुमति जरूरी नहीं थी। इसके बावजूद पुराने भुगतान भी अटके हुए हैं।
नई शर्तों से बढ़ी अड़चन
जानकारी के अनुसार पंचायत राज विभाग ने नए कार्यों के अनुमोदन से पहले कुछ शर्तें रखी हैं। इनमें गांवों के तालाबों को प्लास्टिक मुक्त कराना, अंत्येष्टि स्थल और पंचायत भवन तैयार कराना तथा लाड़िली वन पर गेट का निर्माण शामिल है। इन शर्तों के पूरा न होने से फाइलें अलग-अलग स्तरों पर लंबित बताई जा रही हैं।
प्रशासक व्यवस्था की पृष्ठभूमि
उत्तर प्रदेश में 2021 के चुनाव के बाद बनी ग्राम पंचायतों का पांच वर्ष का कार्यकाल 26 मई 2026 को पूरा हो गया। पंचायतीराज विभाग के आदेश के अनुसार नई ग्राम पंचायतों के गठन तक या अधिकतम छह माह के लिए निवर्तमान प्रधानों को प्रशासक बनाया गया। आदेश में कहा गया था कि प्रशासक सामान्य और नियमित कार्य ही करेंगे और नीतिगत निर्णय के लिए जिलाधिकारी की मंजूरी जरूरी होगी।
हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार को तीन महीने के भीतर पंचायत चुनाव कराने का निर्देश दिया है। साथ ही अदालत ने प्रधानों को प्रशासक बनाए रखने के फैसले को सही माना है। ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए गठित समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का छह माह का कार्यकाल 20 नवंबर को पूरा हो रहा है। आयोग की रिपोर्ट के बाद ही सीटों के आरक्षण और चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
आगे क्या
अब नजर सीडीओ के स्तर पर लंबित 32 फाइलों के अनुमोदन और ब्लॉक स्तर पर अटकी करीब 250 पंचायतों की फाइलों पर रहेगी। प्रशासक व्यवस्था की छह माह की अवधि नवंबर में पूरी हो रही है। इसके बाद क्या व्यवस्था होगी, इस पर अभी सरकार का कोई अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है।

