उत्तराखंड के नैनीताल जिले के ज्योलीकोट क्षेत्र में दूषित पेयजल आपूर्ति के चलते बड़ी संख्या में लोगों के बीमार पड़ने और दो लोगों की मौत के मामले में राज्य सरकार ने सख्त कार्रवाई की है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर जिला प्रशासन की जांच रिपोर्ट के आधार पर जल संस्थान और पेयजल निगम के छह इंजीनियरों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। अधिकारियों पर अपने सरकारी दायित्वों के निर्वहन में लापरवाही बरतने का आरोप है।
किन अधिकारियों पर हुई कार्रवाई
निलंबित किए गए अधिकारियों में उत्तराखंड जल संस्थान हल्द्वानी के प्रभारी अधीक्षण अभियंता विशाल कुमार, नैनीताल जल संस्थान के सहायक अभियंता मोहन सिंह रावत, अपर सहायक अभियंता रवींद्र, तथा पेयजल निगम भीमताल के प्रभारी अधिशासी अभियंता शशिपाल सिंह, सहायक/प्रभारी सहायक अभियंता संजय कुमार आर्या और कनिष्ठ अभियंता दीपांशु शर्मा शामिल हैं। इसके अलावा नैनीताल जल संस्थान के अधिशासी अभियंता को भी चेतावनी दी गई है। निलंबन के बाद विशाल कुमार को मुख्य महाप्रबंधक कार्यालय, देहरादून में संबद्ध किया गया है, जबकि उनकी जगह नंद किशोर को अधीक्षण अभियंता का प्रभार सौंपा गया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि भविष्य में किसी तरह की लापरवाही सामने आने पर संबंधित अधिकारियों के खिलाफ और कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
कई गांवों में फैली बीमारी
ज्योलीकोट और आसपास के इलाकों में दूषित पेयजल आपूर्ति के बाद डायरिया और पीलिया जैसी जलजनित बीमारियां तेजी से फैलीं। प्रभावित क्षेत्रों में बेलुवाखान, ज्योलीकोट, गेठिया, सड़ियाताल, दुर्गापुर, गंजा, वीरभट्टी और छीना गांव शामिल हैं, जहां बड़ी संख्या में ग्रामीण बीमार पड़े। इस बीमारी के चलते एक 16 वर्षीय छात्र और एक 26 वर्षीय महिला की मौत हो गई, जिसके बाद इलाके में चिंता और आक्रोश दोनों बढ़ गए। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने प्रभावित गांवों में राहत और स्वास्थ्य सेवाएं बढ़ाईं। मेडिकल टीमों को घर-घर भेजकर क्लोरीन की गोलियां और ओआरएस बांटे गए, साथ ही आठ डॉक्टरों और एक एंबुलेंस को क्षेत्र में तैनात किया गया।
हाई कोर्ट ने स्थिति को बताया था गंभीर
मामले में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने भी स्वतः संज्ञान लिया। 8 सितंबर को अदालत ने ज्योलीकोट और आसपास के गांवों में स्वच्छ पेयजल और पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे। अदालत ने इस स्थिति को गंभीर बताते हुए नैनीताल के जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल को राहत कार्यों की व्यक्तिगत निगरानी करने के निर्देश दिए थे। जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान नैनीताल की मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. रश्मि पंत ने अदालत को बताया था कि बीमारियों की वजह दूषित पानी था। हाई कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि पेयजल की जांच केवल विभागीय स्तर पर नहीं, बल्कि निजी प्रयोगशालाओं से भी कराई जाए।
सीवर और पेयजल लाइनों की जांच के आदेश
हाई कोर्ट ने जल संस्थान और पेयजल निगम को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए कि सीवर और पेयजल की पाइपलाइन आपस में न मिलें, क्योंकि दोनों के मिश्रण को ही दूषित जलापूर्ति की बड़ी वजह माना जा रहा है। साथ ही नैनीताल शहर में पानी के दूषित होने और सीवर लीकेज की जांच करने तथा 20 से 25 स्थानों से पानी के नमूने लेने के आदेश भी दिए गए। अदालत ने यह भी कहा कि अगर स्थानीय स्तर पर पर्याप्त विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं, तो बाहर से विशेषज्ञ चिकित्सकों को बुलाया जाए। इसके साथ ही कुमाऊं क्षेत्र में जल परीक्षण प्रयोगशाला स्थापित करने के प्रस्ताव पर जल्द निर्णय लेने के लिए संबंधित सचिव को निर्देशित किया गया।
पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले
गौरतलब है कि इससे कुछ महीने पहले मध्य प्रदेश के इंदौर में भी दूषित पानी पीने से कई लोगों की मौत हो चुकी है। ज्योलीकोट प्रकरण ने एक बार फिर पहाड़ी इलाकों में पेयजल आपूर्ति व्यवस्था की निगरानी और रखरखाव को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। फिलहाल प्रशासन का पूरा फोकस प्रभावित गांवों में सुरक्षित पेयजल बहाल करने और स्वास्थ्य सेवाओं को सामान्य बनाने पर है, जबकि हाई कोर्ट के निर्देश पर जांच और सैंपलिंग का काम जारी है।

