नीट-यूजी 2026: सिर्फ एक अभ्यर्थी की आपत्ति पर उत्तर कुंजी विशेषज्ञ को भेजना जरूरी नहीं, हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की

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नीट-यूजी 2026: सिर्फ एक अभ्यर्थी की आपत्ति पर उत्तर कुंजी विशेषज्ञ को भेजना जरूरी नहीं, हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी परीक्षा के विवादित सवालों और उनकी उत्तर कुंजी को विशेषज्ञ समिति के पास भेजना तभी जरूरी है, जब अदालत के सामने इसके लिए ठोस आधार मौजूद हो। सिर्फ एक अभ्यर्थी की आपत्ति और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) द्वारा उसकी जांच के बाद उसे खारिज कर दिए जाने भर से यह जरूरी नहीं हो जाता। इसी टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने नीट-यूजी 2026 के एक अभ्यर्थी की याचिका खारिज कर दी।

क्या था विवाद

याचिकाकर्ता ने नीट-यूजी 2026 की परीक्षा में प्रश्न संख्या 60 और 70 की उत्तर कुंजी को चुनौती दी थी। पहला प्रश्न शून्य-क्रम अभिक्रिया (जीरो-ऑर्डर रिएक्शन) से जुड़ा था, जबकि दूसरा ऑक्सीजन की प्रथम आयनीकरण एन्थैल्पी पर आधारित कथन-कारण प्रकार का सवाल था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि ये दोनों प्रश्न जेईई मेन 2019 और 2022 की परीक्षाओं में भी पूछे जा चुके हैं, और उस समय जारी उत्तर कुंजी में इनके अलग उत्तर बताए गए थे। उसका दावा था कि उसने उसी आधार पर उत्तर दिए, जिन्हें एनटीए की उत्तर कुंजी में गलत मान लिया गया।

अदालत में क्या हुई बहस

सुनवाई के दौरान अदालत के सवाल पर याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने स्वीकार किया कि संभवतः उनका मुवक्किल ही अकेला अभ्यर्थी था, जिसने इन दोनों प्रश्नों की उत्तर कुंजी पर आपत्ति दर्ज कराई थी। हालांकि उन्होंने दलील दी कि इससे अदालत की असाधारण शक्तियां सीमित नहीं होतीं और मामले को विशेषज्ञ के पास भेजा जा सकता है। अधिवक्ता ने बताया कि न तो वे और न ही याचिकाकर्ता विषय-विशेषज्ञ हैं, और याचिकाकर्ता ने इस मुद्दे पर अपने सेवानिवृत्त शिक्षक पिता से भी राय ली थी। अपने पक्ष को मजबूत करने के लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के वंशिका यादव बनाम भारत संघ मामले का हवाला दिया, जिसमें शीर्ष अदालत ने एक विवादित प्रश्न का सही उत्तर तय करने के लिए आईआईटी दिल्ली के निदेशक को तीन सदस्यीय विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया था।

इसके जवाब में एनटीए की ओर से बताया गया कि याचिकाकर्ता की आपत्ति की विधिवत जांच की गई थी और मौजूदा उत्तर कुंजी को ही सही पाया गया। एजेंसी ने सुप्रीम कोर्ट के यूपीपीएससी बनाम राहुल सिंह फैसले का हवाला देते हुए कहा कि परीक्षा एजेंसी की उत्तर कुंजी को सामान्यतः सही मानकर चलना चाहिए और अदालतों को अकादमिक मामलों में गहराई से हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए। संदेह की स्थिति में इसका लाभ परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था को मिलना चाहिए, न कि अभ्यर्थी को।

कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका

खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के दोनों फैसलों को साथ पढ़ते हुए कहा कि किसी प्रश्न को विशेषज्ञ के पास भेजने के लिए अदालत के सामने ऐसी ठोस सामग्री का होना जरूरी है, जो इस तरह के संदर्भ को वाजिब ठहराए। कोर्ट ने वंशिका यादव मामले और मौजूदा मामले में स्पष्ट अंतर बताया। कोर्ट के अनुसार, वंशिका यादव मामले में एनटीए ने खुद अभ्यर्थियों की कई आपत्तियों पर विचार करते हुए दो विकल्पों को सही मान लिया था और अंक भी दिए थे। इसके उलट मौजूदा मामले में अदालत के सामने केवल एक अभ्यर्थी की आपत्ति थी, जिसे एनटीए पहले ही जांचकर खारिज कर चुका था, और किसी अन्य अभ्यर्थी ने इस पर सवाल नहीं उठाया था। इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता और याचिका खारिज कर दी।

यह फैसला क्यों अहम है

यह आदेश नीट-यूजी जैसी बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में उत्तर कुंजी को चुनौती देने वाली याचिकाओं के लिए एक स्पष्ट कसौटी तय करता है। कोर्ट के इस रुख से यह संकेत मिलता है कि किसी एक अभ्यर्थी की आपत्ति, जिसे परीक्षा एजेंसी पहले ही जांच चुकी हो, अदालत को स्वतः विशेषज्ञ समिति बनाने के लिए बाध्य नहीं करती। साथ ही यह फैसला वंशिका यादव मामले की सीमाओं को भी रेखांकित करता है, जहां एनटीए ने स्वयं आपत्ति को स्वीकार किया था — यानी हर मामले में परिस्थितियां अलग होने पर अदालत अलग नजरिया अपनाएगी।

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