अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की चढ़ावा चोरी के मामले में जांच एजेंसी ने विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) रजत वर्मा की अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर दिया है। अदालत ने इसकी मुख्य 59 पन्नों की चार्जशीट पर संज्ञान लिया है, जबकि साक्ष्य के तौर पर 36,039 पन्नों के दस्तावेज और 101 सीडी अलग से पेश की गई हैं। मामले में कुल आठ लोगों को आरोपी बनाया गया है, जबकि अभियोजन पक्ष ने 133 गवाहों की सूची दाखिल की है। अब अदालत में इन्हीं गवाहों के बयान मुकदमे की दिशा तय करेंगे, जिनमें ट्रस्ट के पूर्व लेखा प्रभारी महिपाल सिंह और पूर्व महासचिव चंपत राय की गवाही पर सबसे ज्यादा नजरें टिकी हैं।
क्या है पूरा मामला
अयोध्या में राम मंदिर के चढ़ावे में गड़बड़ी की बात जून की शुरुआत में सामने आई थी। इसके बाद 25 जून को राम जन्मभूमि थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई और मामले की जांच विशेष जांच दल (एसआईटी) को सौंपी गई। जांच के दौरान पुलिस ने आठ आरोपियों को हिरासत में लेकर पूछताछ की और बरामदगी की कार्रवाई भी की। बुधवार को यह आरोप पत्र अदालत में दाखिल किया गया, जिसमें अनुकल्प मिश्रा, करुणेश पांडेय, मनीष कुमार यादव, लवकुश मिश्रा, रमाशंकर मिश्रा, अविनाश शुक्ला, रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू और सुभाष श्रीवास्तव को आरोपी बनाया गया है। इन आरोपियों की जमानत अर्जियां पहले ही अदालत खारिज कर चुकी है।
गौरतलब है कि ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय, पूर्व ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्र और निर्माण प्रभारी गोपाल राव को पुलिस ने आरोपी नहीं, बल्कि गवाह के तौर पर शामिल किया है। इस फैसले पर अयोध्या बार एसोसिएशन से जुड़े कुछ अधिवक्ताओं ने आपत्ति जताई और अदालत परिसर के बाहर विरोध भी दर्ज कराया। इससे पहले बार एसोसिएशन की ओर से चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्र समेत अन्य के खिलाफ तहरीर भी दी गई थी, हालांकि पुलिस ने जांच के आधार पर इन्हें आरोपियों की सूची में शामिल नहीं किया।
महिपाल सिंह की गवाही क्यों अहम
महिपाल सिंह जनवरी 2021 से मई 2022 तक ट्रस्ट में लेखा प्रभारी के पद पर रहे थे। चढ़ावे की गणना और लेखा-व्यवस्था से सीधे जुड़े होने के कारण उन्हें नकदी के साथ-साथ सोना-चांदी और विदेशी मुद्रा के प्रबंधन की भी जानकारी थी। आरोप पत्र में दर्ज जानकारी के अनुसार, महिपाल सिंह ने इन चीजों के प्रबंधन में अनियमितता को लेकर सवाल उठाए थे और इसकी जानकारी तत्कालीन महासचिव चंपत राय समेत ट्रस्ट के अन्य पदाधिकारियों को देने का दावा किया था। सितंबर में नई एसआईटी टीम ने वीडियो कॉल के जरिये उनका क्रमवार बयान दर्ज किया।
यह पहला मौका नहीं है जब महिपाल सिंह के आरोप चर्चा में आए हों। अगस्त में उन्होंने एसआईटी को भेजे एक ईमेल में मंदिर परिसर के बाहर रामकोट में लगाए गए एल्यूमिनियम-शीशे के केबिनों के भुगतान में करीब तीन लाख रुपये की गड़बड़ी का आरोप लगाया था। इस पर ट्रस्ट से जुड़े महंत शशिकांत दास ने पलटवार करते हुए इन आरोपों को पूरी तरह झूठा और मनगढ़ंत बताया था। अदालत में अब उनकी गवाही से यह स्पष्ट होना अहम होगा कि उन्होंने वास्तव में क्या देखा, किसे और कब सूचना दी तथा शिकायत के बाद क्या कार्रवाई हुई। हालांकि, किसी बयान में नाम आने भर से किसी व्यक्ति का अपराध सिद्ध नहीं हो जाता — अभियोजन को इन दावों की पुष्टि स्वतंत्र साक्ष्यों और दस्तावेजों से करनी होगी।
चंपत राय की गवाही से जुड़ेगी घटना की पहली कड़ी
पूर्व महासचिव चंपत राय मामले में आरोपी नहीं, बल्कि अभियोजन पक्ष के गवाह हैं और आरोप पत्र में उनके खिलाफ कोई आपराधिक संस्तुति नहीं की गई है। उनकी गवाही चोरी की घटना की सबसे पहली सूचना और उसके बाद ट्रस्ट स्तर पर हुई कार्रवाई से जुड़ी है। आरोप पत्र के मुताबिक 4 जून को गणना कर्मियों ने चोरी से जुड़ा वीडियो और संदेश उन्हें भेजे थे, जिसके अगले दिन कारसेवकपुरम स्थित उनके आवास पर डॉ. अनिल मिश्र और गोपाल राव समेत अन्य लोग पहुंचे और वे वीडियो एक साथ देखे गए। यह उल्लेखनीय है कि मामला सामने आने के शुरुआती दिनों में ट्रस्ट पदाधिकारियों के बयानों में भी विरोधाभास देखने को मिला था — जहां एक ओर गड़बड़ी की आशंका को नकारा गया, वहीं ट्रस्ट के सलाहकार नृपेंद्र मिश्र ने बाद में चोरी की बात स्वीकार करते हुए इसे गंभीर घटना करार दिया था। एसआईटी की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद जुलाई में ट्रस्ट ने चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्र के इस्तीफे भी स्वीकार कर लिए थे।
डॉ. अनिल मिश्र और गोपाल राव भी आरोप पत्र में गवाह के तौर पर शामिल हैं। दोनों ट्रस्ट की व्यवस्थाओं से जुड़े महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं, ऐसे में उनकी गवाही से चढ़ावा गणना की आंतरिक व्यवस्था, सुरक्षा-निगरानी के इंतजाम, घटना की जानकारी मिलने के तरीके और उसके बाद हुई कार्रवाई से जुड़े तथ्य सामने आ सकते हैं।
आगे क्या
अदालत ने आरोप पत्र पर संज्ञान लेने के साथ ही लॉयर्स एसोसिएशन की ओर से जांच में हस्तक्षेप की मांग वाली याचिका पर भी सुनवाई की, लेकिन वकीलों के हलफनामों को साबित करने के लिए पर्याप्त ठोस सबूत न मिलने पर याचिका का निपटारा कर दिया गया। अब मुकदमे में यह देखना अहम होगा कि गवाहों के बयान आरोप पत्र में दर्ज सीसीटीवी फुटेज, बरामदगी, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य, दस्तावेजों और अन्य गवाहों के कथनों से किस हद तक मेल खाते हैं। मामले का अंतिम निष्कर्ष अदालत में पेश साक्ष्यों और जिरह के आधार पर ही तय होगा।

