नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी में कहा कि कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) और उसकी अपीलीय संस्था NCLAT को पूरी तरह अपने नियंत्रण में ले लिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि दोनों ट्रिब्यूनल के अध्यक्षों को नियुक्तियों के मामले में पूरी स्वायत्तता मिलनी चाहिए। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। ये टिप्पणियां कोर्ट के अंतिम आदेश का हिस्सा नहीं हैं।
किस याचिका पर हुई सुनवाई
मामला NCLT और NCLAT में काम कर रहे संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) कर्मचारियों की याचिका का है। कर्मचारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने दलील दी कि 1 या 2 नवंबर को मौजूदा कर्मचारियों को काम छोड़ना पड़ सकता है और उनकी जगह नियुक्तियां एक निजी कंपनी के जरिए होंगी। उनके अनुसार ये कर्मचारी छह साल तक काम कर चुके हैं और संविदा पर होने के बावजूद उनके कुछ अधिकार बनते हैं।
अरोड़ा ने कहा कि NCLT के भर्ती नियमों और विज्ञापन में नियमितीकरण का प्रावधान है। ऐसे में उन्हें अचानक बाहर करना मनमाना होगा और संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन करेगा।
पीठ ने क्या कहा
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ठेकेदार कैसे काम करते हैं, यह उन्हें पता है, और उन्हें न्यायिक या तकनीकी सदस्यों की परवाह नहीं होती। उनके मुताबिक अध्यक्षों के पास “पूरी स्वायत्तता” होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि ट्रिब्यूनल को मंत्रालय ने पूरी तरह अपने कब्जे में ले लिया है, जो संस्था की स्वायत्तता पर असर डालता है। उन्होंने इसे “बहुत दुर्भाग्यपूर्ण” बताया और कहा कि मंत्रालय इस पर पूरा नियंत्रण रखना चाहता है।
पीठ ने संविदा आधार पर नियुक्तियों के प्रति भी असहमति जताई। रिपोर्टों के अनुसार कोर्ट ने कहा कि नियुक्ति की सिफारिश NCLT अध्यक्ष की ओर से आनी चाहिए और नियुक्ति की पूरी शक्ति उन्हीं के पास होनी चाहिए। मुख्य न्यायाधीश ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि मुंबई में एक मामले में संविदा कर्मचारी मूल रिपोर्ट लेकर चले गए थे और इसके बाद प्राथमिकी दर्ज करानी पड़ी थी।
अंतरिम उपाय और आगे की प्रक्रिया
कोर्ट ने अंतरिम व्यवस्था के रूप में सरकारी विभागों के अनुभवी लोगों को प्रतिनियुक्ति (डेपुटेशन) पर लाने का सुझाव दिया। इसके बाद UPSC या SSC के जरिए चरणबद्ध तरीके से नियमित भर्ती की बात कही गई। पीठ ने NCLT और NCLAT के अध्यक्षों से कहा है कि वे चार सप्ताह के भीतर स्टाफ, बुनियादी ढांचे और अन्य जरूरतों के बारे में विस्तृत प्रस्ताव दें। रिपोर्टों के अनुसार कोर्ट ने मामले में नोटिस भी जारी किया है।
सुनवाई में बताया गया कि NCLT की दिल्ली स्थित प्रधान पीठ की इमारत की हालत खराब है और कई मंजिलें बंद हैं। वकीलों के संगठन ने कोर्ट को यह भी बताया कि न्यायिक और तकनीकी सदस्यों के 16 पद खाली हैं। कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से कहा कि वे केंद्र सरकार को ट्रिब्यूनलों को बुनियादी सुविधाएं जल्द उपलब्ध कराने की जरूरत बताएं। अटॉर्नी जनरल ने सरकार के प्रतिनिधियों, NCLT अध्यक्ष और वकीलों के संगठनों की संयुक्त बैठक का सुझाव दिया। मंत्रालय की ओर से इन टिप्पणियों पर अब तक कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
पृष्ठभूमि
NCLT कंपनी कानून से जुड़े विवादों और दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) के तहत दिवालिया मामलों की सुनवाई करता है, जबकि NCLAT उसके आदेशों के खिलाफ अपील सुनता है। रिपोर्टों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल में दिवाला समाधान योजनाओं की मंजूरी में देरी का स्वतः संज्ञान लिया था और इस पर तेजी से कदम उठाने की जरूरत बताई थी।
आगे क्या
अब नजर चार सप्ताह में आने वाले प्रस्तावों और अगली सुनवाई पर रहेगी। उसी में तय होगा कि NCLT और NCLAT में स्टाफ की नियुक्ति किस व्यवस्था से होगी।

