समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने वाराणसी में कहा कि वह 2027 का विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे और लोकसभा सदस्य रहते हुए ही मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। इस पर उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी ने उन्हें ‘रणछोड़’ कहा है। अखिलेश ने भी पलटवार करते हुए चौधरी से अपना टिकट पहले घोषित करने को कहा है।
वाराणसी में अखिलेश ने क्या कहा
मंगलवार को वाराणसी पहुंचे अखिलेश यादव से पत्रकारों ने पूछा कि क्या वह काशी की किसी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने यह जवाब हल्के-फुल्के अंदाज में दिया। उन्होंने कहा, “हम तब मुख्यमंत्री बनते हैं जब चुनाव नहीं लड़ते हैं। पिछली बार कहां से मुख्यमंत्री बना था, बताओ? लोकसभा से… तो फिर वहीं से आकर शपथ लूंगा।”
अखिलेश 2012 में कन्नौज से लोकसभा सांसद रहते हुए मुख्यमंत्री बने थे। उस समय वह विधानमंडल के किसी सदन के सदस्य नहीं थे और बाद में उन्होंने लोकसभा से इस्तीफा दिया था। 2022 में वह पहली बार विधानसभा चुनाव लड़े थे। फिलहाल वह कन्नौज से सांसद हैं। संविधान के अनुसार, किसी सदन का सदस्य न होने पर भी कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री बन सकता है, पर उसे छह महीने के भीतर विधानमंडल का सदस्य बनना होता है।
पंकज चौधरी का तंज
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने बुधवार को सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, “रणछोड़ अखिलेश, पहले चुनौती दी, अब भाग खड़े हुए।” उन्होंने सवाल उठाया कि क्या अखिलेश अब सीधे लोकसभा से मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे, और इसकी तुलना ‘बिना चुनाव के रिजीम चेंज’ से की। उनका यह भी कहना था कि जब सपा सत्ता में थी, तब अखिलेश नोएडा जाने से डरते थे और अब चुनाव लड़ने से डर रहे हैं। यूपी की सियासत में लंबे समय से यह मान्यता रही है कि नोएडा जाने वाले मुख्यमंत्री की कुर्सी चली जाती है।
राज्य सरकार में मंत्री और सुभासपा अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने भी अखिलेश को घेरा। उन्होंने कहा, “नेता क्या जो चुनाव से भागे? आइए हो जाए दो-दो हाथ।”
अखिलेश का पलटवार
अखिलेश यादव ने भी लंबी पोस्ट के जरिए जवाब दिया। उन्होंने कहा कि जिनका अपना टिकट उनके पड़ोसी पक्का नहीं होने दे रहे, वे चुप ही रहें तो बेहतर है। अखिलेश ने ‘रणछोड़’ शब्द पर भी आपत्ति जताई। उनका कहना था कि यह भगवान कृष्ण का भी एक नाम है और इसे नकारात्मक अर्थ में इस्तेमाल करना ठीक नहीं।
लोकसभा से सीधे मुख्यमंत्री बनने वाली टिप्पणी पर उन्होंने गोरखपुर के भाजपा खेमे की आपसी खींचतान का जिक्र किया। यह उनका दावा है, जिस पर भाजपा की प्रतिक्रिया इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक सामने नहीं आई थी। अखिलेश ने अपने पुराने सवाल दोहराए, जैसे विधानसभा बड़ी या लोकसभा, और प्रदेश अध्यक्ष बड़ा या राष्ट्रीय अध्यक्ष। अंत में उन्होंने चौधरी से कहा कि प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते वह भाजपा का सबसे पहला टिकट अपना ही घोषित करें।
अयोध्या वाली चुनौती का संदर्भ
इस बहस की पृष्ठभूमि अक्टूबर की ‘चुनौती वाली राजनीति’ है। अखिलेश ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से कहा था कि अगर उन्हें अपनी लोकप्रियता पर भरोसा है तो वह अयोध्या से चुनाव लड़ें। सपा अयोध्या सीट से पवन पांडेय को उम्मीदवार घोषित कर चुकी है। अखिलेश ने बाद में इसे चुनौती नहीं, ‘राजनीतिक सलाह’ बताया। योगी आदित्यनाथ ने 10 अक्टूबर को बलरामपुर में कहा कि वह इस सलाह को स्वीकार करते हैं और अखिलेश भी वहां से नामांकन करें। राजभर और मंत्री दयाशंकर सिंह ने भी अखिलेश को अयोध्या से चुनाव लड़ने की चुनौती दी थी। इसी वजह से भाजपा अब अखिलेश के चुनाव न लड़ने के बयान को उसी चुनौती से जोड़कर देख रही है।
आगे क्या
उत्तर प्रदेश में 403 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव 2027 की शुरुआत में होने हैं। अब तक सपा की ओर से इस बात का स्पष्टीकरण नहीं आया है कि अखिलेश का बयान अंतिम फैसला है या सिर्फ सियासी चुटकी। आने वाले दिनों में उम्मीदवारों की घोषणा के साथ तस्वीर साफ होगी।
अपडेट: यह खबर 4 नवंबर 2026 की दोपहर तक की प्रतिक्रियाओं पर आधारित है। नई प्रतिक्रिया आने पर इसे अपडेट किया जाएगा।

