हाईकोर्ट ने नाबालिग से दुष्कर्म के दोषी की 10 साल की सजा रखी बरकरार, कहा- पीड़िता की भरोसेमंद गवाही दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त

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हाईकोर्ट: पीड़िता की भरोसेमंद गवाही दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त, 10 साल की सजा बरकरार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में गाजियाबाद के एक दोषी की 10 साल की सजा बरकरार रखी है। न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद की एकल पीठ ने दोषी की अपील खारिज करते हुए कहा कि पीड़िता की विश्वसनीय और भरोसेमंद गवाही दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त साक्ष्य हो सकती है। अदालत ने साफ किया कि मेडिकल जांच में चोट के निशान न मिलना और एफआईआर में देरी, गवाही की अहमियत को कम नहीं करते।

अभियोजन का पक्ष

अभियोजन के अनुसार, पीड़िता का परिवार रात में पड़ोस में जागरण देखने गया था। सुबह करीब चार बजे लौटने पर पीड़िता घर से गायब मिली। पूछताछ में पता चला कि पीड़िता का एक दूर का रिश्तेदार उसे बहला-फुसलाकर ले गया है। आरोपी शादीशुदा है और तीन बच्चों का पिता है।

अदालत ने पाया कि पीड़िता ने अपने बयान में कहा कि आरोपी उसे पहले भी ले जा चुका था। दूसरी बार वह शादी का झांसा देकर उसे फरीदाबाद ले गया और किराये के कमरे में पत्नी बताकर रखा।

उम्र का सवाल

अपील में पीड़िता की उम्र भी अहम मुद्दा रही। हाईस्कूल प्रमाणपत्र के अनुसार, घटना के समय उसकी उम्र 16 वर्ष थी, जबकि मुख्य चिकित्सा अधिकारी की जांच में उम्र 18 वर्ष बताई गई थी। अदालत ने हाईस्कूल प्रमाणपत्र को महत्वपूर्ण माना। रिपोर्टों के अनुसार, ट्रायल कोर्ट ने आईपीसी की धारा 363, 366 और 376 के तहत 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि अदालत ने नाबालिग की कथित सहमति को बचाव का आधार नहीं माना।

अदालत ने क्या कहा

पीठ ने कहा कि यदि पीड़िता की गवाही विश्वसनीय, भरोसेमंद और उच्च गुणवत्ता की है, तो बिना किसी स्वतंत्र पुष्टि के भी उसके आधार पर दोषसिद्धि हो सकती है। इसके बाद अदालत ने ट्रायल कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए अपील खारिज कर दी।

एक अन्य मामले में अलग टिप्पणी

इसी पीठ ने हाल में करीब चार दशक पुराने एक अन्य मामले में कहा था कि यौन अपराध के मामलों में पीड़िता की गवाही महत्वपूर्ण है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता और परिस्थितियों से मेल खाने की जांच किए बिना उसे अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। उस मामले में अदालत ने साक्ष्यों में विरोधाभास और एफआईआर में देरी के आधार पर आरोपियों को बरी किया था।

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