नौचंदी मेला 2026: तिरंगे और अखाड़ों के झंडों संग नदी में उतरे हिंदू-मुस्लिम तैराक, पेश की गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल

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नौचंदी मेला 2026: तिरंगे और अखाड़ों के झंडों संग नदी में उतरे हिंदू-मुस्लिम तैराक, पेश की गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल

मेरठ के ऐतिहासिक नौचंदी मेले में बृहस्पतिवार को एक बार फिर सांप्रदायिक सौहार्द की वही परंपरा जीवंत हो उठी, जिसके लिए यह मेला सदियों से जाना जाता है। हिंदू और मुस्लिम अखाड़ों के युवा तैराकों ने साथ मिलकर तिरंगा और अखाड़ों के पारंपरिक झंडे लेकर नदी में छलांग लगाई और गंगा-जमुनी तहजीब की एक और मिसाल पेश की।

गाजे-बाजे के साथ शुरू हुई परंपरा

कार्यक्रम की शुरुआत गाजे-बाजे और ढोल-नगाड़ों की थाप पर हुई। दोनों समुदायों के युवा रामबाग स्थित सीताराम घाट और सैय्यद क्षेत्र में एकत्र हुए। वहां से तिरंगा और अखाड़ों के पारंपरिक झंडे थामे युवाओं का समूह नदी में उतरा और तैरते हुए हाथी घाट, मोती महल तथा दशहरा घाट तक पहुंचा।

घाटों पर पुष्पवर्षा से हुआ स्वागत

तैराकों के घाटों पर पहुंचने पर वहां पहले से मौजूद लोगों ने ढोल-नगाड़ों की गूंज और पुष्पवर्षा के साथ उनका जोरदार स्वागत किया। इस दौरान माहौल उत्सव जैसा बना रहा और हर उम्र के लोग इस दृश्य को देखने के लिए घाटों पर जुटे।

मुगलकाल से चली आ रही है परंपरा

नौचंदी मेला उत्तर प्रदेश के सबसे पुराने और प्रसिद्ध मेलों में गिना जाता है, जिसकी शुरुआत मुगलकाल में हुई मानी जाती है। यह मेला मां नवचंडी देवी के नाम पर आधारित है और इसकी खासियत यह है कि नवचंडी देवी का मंदिर तथा हजरत बाले मियां की दरगाह एक-दूसरे के बेहद निकट स्थित हैं। मेले के दौरान मंदिर में भजन-कीर्तन और दरगाह पर कव्वाली एक साथ गूंजते हैं, जो इस मेले को धार्मिक सौहार्द का प्रतीक बनाते हैं। मान्यता है कि शहर में जब भी सांप्रदायिक तनाव की स्थिति बनी, नौचंदी मेले ने ही समुदायों के बीच की दूरियां कम करने में भूमिका निभाई।

दिनभर चला मेला, हर उम्र के लोग पहुंचे

तैराकों के इस पारंपरिक आयोजन के अलावा दिनभर मेले में सांस्कृतिक कार्यक्रम भी चलते रहे। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर उम्र के लोग मेला परिसर में पहुंचे और झूलों, दुकानों तथा सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आनंद उठाया।

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